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Updated Thu, 5 Aug 2021 13:03 IST
नई दिल्ली: चेक रिपब्लिक की सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए महिलाओं के हक में अहम बिल पर मुहर लगा दी है. इस बिल के मुताबिक अब अगर बगैर सहमति के किसी महिला की नसबंदी की जाती है तो उसे मुआवजा दिया जाएगा. राष्ट्रपति मिलोस ज़ेमन ने इस बिल पर साइन करने के बाद इसे बड़ी जीत बताया है.
हमारी सहयोगी वेबसाइट Wion की खबर के मुताबिक ऐसी महिलाओं के लिए सरकार ने करीब 14 हजार अमेरिकी डॉलर (करीब 10 लाख रुपये) का मुआवजा तय किया है. देश में ज्यादातर रोमा महिलाओं के साथ ऐसी घटनाएं हुई थीं, यह रोमा या रोमानी समुदाय अल्पसंख्यक है और माना जाता है कि यह लोग काफी पहले भारत से पलायन कर गए थे. मानव अधिकार कार्यकर्ता ग्वेन्डोलिन अलबर्ट महिलाओं के हक के लिए काफी दिनों से आवाज उठा रहे थे और अब इस फैसले पर उनका कहना है कि कई दिनों से ऐसा गलत काम हो रहा था और अब इस समस्या का हल जल्द निकल सकता है.
गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 1966 से 2012 के बीच कई महिलाओं की जबरन नसबंदी करने के मामले सामने आ चुके हैं और उन्हें इस दर्दनाक हादसे से गुजरना पड़ा. यहां महिलाओं को धमकाकर और लालच देकर उनकी नसबंदी की जाती थी.
ऐसे मामलों को लेकर कोई पुष्ट आंकड़े तो नहीं है लेकिन माना जाता है कि सैकड़ों महिलाओं के साथ इस तरह का अत्याचार हो चुका है. हालांकि 1989 में कम्युनिस्ट सरकार आने के बाद इस चलन पर रोक लगाई गई थी. लेकिर फिर भी डिलीवरी के वक्त उनके साथ धोखा करके सहमति पत्र पर साइन कराए जाते थे. कुछ मामले ऐसे भी थे जब उन्हें नसबंदी के बारे में जानकारी तक नहीं दी जाती थी.
नए कानून के बाद मुआवजों के मामले स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आएंगे, यह प्रक्रिया कब से चालू होगी, इसका ऐलान होना अभी बाकी है. मुआवजे के लिए पीड़ितों को अपने दावे के मुताबिक जरूरी सबूत भी पेश करने होंगे. सामाजिक कार्यकर्ता एलेना गोरोलोवा ने इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए बताया कि 21 साल की उम्र में उनकी भी नसबंदी कर दी गई थी.







