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10 May, 2026
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Updated Sat, 15 May 2021 22:09 IST
आज यानि 14 मई 1948 को इजरायल को आजादी मिली थी लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र संघ में इजरायल और फिलिस्तीन दो देश बनाने का प्रस्ताव पेश हुआ तो भारत ने इसके खिलाफ वोट दिया था. तब नेहरू फ़िलिस्तीन के बंटवारे के ख़िलाफ़ थे. इसी आधार पर भारत ने 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के गठन के ख़िलाफ़ वोट किया था.
हालांकि फिर भारत ने 17 सितंबर, 1950 को आधिकारिक रूप से इजरायल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दी. हालांकि ऐसा करने के बाद भी भारत और इजरायल के बीच राजनयिक संबंध लंबे समय तक नहीं रहे. भारत ने 1992 में इजरायल के साथ राजनयिक संबंध बहाल किया. ये तब हुआ जब भारत में पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने.
इस बारे में "आब्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन" की वेबसाइट www.orfonline.org में पिनाक रंजन चक्रवर्ती कs एक लेख "व्हेन आइंस्टीन ट्राइड टू कंवींस नेहरू टू सपोर्ट इजरायल..बट फेल्ड" (When Einstein tried to convince Nehru to support Israel… but failed) प्रकाशित किया है. जिसमें इस पूरे वाकये पर रोशनी डाली गई है. लेख कहता है कि तब मशहूर वैज्ञानिक आइंस्टीन ने नेहरू को पत्र लिखकर इस संबंध में आश्वस्त करने की कोशिश की थी लेकिन नेहरू पर इसका कोई असर नहीं पड़ा था.
लेख के अनुसार, इजरायल का जन्म अरबों के तगड़े विरोध के बीच हुआ. ज्यूश एंजेंसी के हेड डेविड बेन गुरियन की अगुवाई में बना इजरायल तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच मान्यता के लिए संघर्ष कर रहा था. गुरियन उसके पहले प्रधानमंत्री बने थे.
तब भारत ने इजरायल बनने के विरोध में वोट दिया था
तब संयुक्त राष्ट्र में तर्क दिया गया कि फिलिस्तीनी अरबों के साथ यहूदी लोगों का भी देश होना चाहिए. भारत ने इसके खिलाफ वोट तो दिया लेकिन ज्यादा ज्यादा वोट इजरायल और फिलिस्तीन दो अलग देश और स्वतंत्र देश बनाने के लिए पड़े. इस योजना के पक्ष में 33 वोट पड़े तो विपक्ष में 13 जबकि 10 देश वोटिंग से गैरहाजिर रहे.
क्या है बालफोर घोषणापत्र
अमेरिका ने बालफोर घोषणापत्र (1917) का समर्थन किया. आर्थर बालफोर ब्रिटेन के विदेश सचिव थे, जिन्होंने फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाने की जरूरत बताई थी. यह घोषणापत्र ब्रिटेन की तरफ़ से था जिसमें कहा गया था कि फ़लस्तीन में यहूदियों का नया देश बनेगा. इस घोषणापत्र का अमरीका ने भी समर्थन किया था. हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी रुजवेल्ट ने 1945 में आश्वासन दिया था कि अमरीका अरबी लोगों और यहूदियों से परामर्श के बिना किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगा.
आइंस्टीन ने नेहरू को क्या चिट्ठी लिखी थी
हालांकि भारत के रुख के बारे में कुछ भी गोपनीय नहीं था. उसी दौरान नेहरू को दुनिया के जाने-माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने चिट्ठी लिखी और ये अपील की कि भारत को इजरायल के पक्ष में वोट करना चाहिए. हालांकि आइंस्टीन की बात को भी नेहरू ने स्वीकार नहीं किया. आइंस्टीन खुद यहूदी थे. जर्मनी में यहूदियों के नरसंहार के बीच ही उन्होंने अमेरिका में जाकर शरण ली थी.
आइंस्टीन ने खारिज कर दिया था राष्ट्रपति बनना
आइंस्टीन को भी लगता था कि अगर यहूदियों के लिए कोई देश बनता है तो यहूदियों से जुड़ी संस्कृति, यातना सह रहे यहूदी शरणार्थी और दुनियाभर में बिखरे यहूदियों के बीच एक भरोसा जगेगा. हालांकि आइंस्टीन चाहते थे कि इजरायल में अरबी और यहूदी दोनों एक साथ रहें. इजरायल के पहले प्रधानमंत्री बेन गूरियन ने अल्बर्ट आइंस्टीन को इजरायल का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव भी दिया था, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था.
नेहरू ने क्या जवाब दिया था
नेहरू फिलिस्तीन के बंटवारे को लेकर सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि फिलिस्तीन में अरबी सदियों से रह रहे हैं. जब एक यहूदी देश बनेगा तो उन्हें बेदखल होना पड़ेगा जो कि उचित नहीं होगा. नेहरू ने आइंस्टीन की चिट्ठी के जवाब में यही कहा भी था.
आइंस्टीन की चिट्ठी में क्या था
आइंस्टीन ने नेहरू को 13 जून 1947 को चार पन्ने की एक चिट्ठी लिखी थी. इस ख़त में आइंस्टीन ने भारत में छुआछूत ख़त्म करने की तारीफ़ की थी. उन्होंने लिखा कि यहूदी भी दुनियाभर में भेदभाव और अत्याचार के शिकार हैं. उनका साथ देने की जरूरत है.
उन्होंने नेहरू को लिखे खत में कहा था, ''सदियों से यहूदी दरबदर जीवन जी रहे हैं. लाखों यहूदियों को तबाह कर दिया गया. दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं जहां वो ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकें. एक सामाजिक और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के नेता के रूप में मैं आपसे अपील करता हूं कि आप यहूदियों के आंदोलन के साथ खड़े हों.''
नेहरू ने ये सवाल भी किया
तब नेहरू ने इस पत्र का जवाब दिया, ''मेरे मन में यहूदियों को लेकर पूरी तरह सहानुभूति है. लेकिन अरबों को लेकर भी सहानुभूति कम नहीं. मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में शानदार काम किया है. लोगों के जीवनस्तर को बेहतर बनाने में योगदान दिया है, लेकिन ये सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है कि अरबों में यहूदियों के प्रति भरोसा क्यों नहीं बन पाया?''
फिर कब नेहरू ने इजरायल को मान्यता दी







