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अंतरिक्ष में क्यों बढ़ जाती है इंसान की लंबाई और धरती पर आते ही घट जाती है

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Updated Mon, 29 Nov 2021 12:26 IST

अंतरिक्ष में क्यों बढ़ जाती है इंसान की लंबाई और धरती पर आते ही घट जाती है

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों पर हुई रिसर्च बताती है कि वाकई ऐसा है कि अंतरिक्ष में रहने पर लंबाई बढ़ जाती है. ये कितनी बढ़ती है और कैसे बढ़ती है, ये जानना भी कुछ कम रोचक नहीं है. लेकिन आखिर क्यों बढ़ी हुई लंबाई वाला इंसान जब वापस लौटता है तो उसके साथ क्या होता है.

अंतरिक्ष के बारे में नीले आसमान, काले बादलों और चांद-तारों से ज्यादा हम शायद ही कुछ जानते हों. आमतौर पर खोजकर्ताओं और शोधकर्ताओं के लिए रिजर्व किए जा चुके अंतरिक्ष के बारे में कई दिलचस्प और अजीब बातें हैं, जिनका आम इंसान तसव्वुर भी नहीं कर सकता. साइंस फिक्शन से भी ज्यादा हैरतअंगेज है अंतरिक्ष की दुनिया.

 अंतरिक्ष में छह महीने बिताने के बाद अंतरिक्षयात्री अपनी वास्तविक ऊंचाई से लगभग तीन प्रतिशत लंबे हो जाते हैं. इसकी वजह ये है कि उन पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का कोई असर नहीं रहता है, जिससे उनका कद बढ़ जाता है. हालांकि ये अस्थायी है और जमीन पर लौटने के कुछ ही महीनों के भीतर कद वापस पहले जैसा हो जाता है.

अंतरिक्ष में छह महीने बिताने के बाद अंतरिक्षयात्री अपनी वास्तविक ऊंचाई से लगभग तीन प्रतिशत लंबे हो जाते हैं. इसकी वजह ये है कि उन पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का कोई असर नहीं रहता है, जिससे उनका कद बढ़ जाता है. हालांकि ये अस्थायी है और जमीन पर लौटने के कुछ ही महीनों के भीतर कद वापस पहले जैसा हो जाता है.

 स्पेस में पानी उबालें तो धरती से एकदम अलग अनुभव होगा. यहां उबलते पानी में सैकड़ों-हजारों बुलबुले बनते हैं, जबकि अंतरिक्ष में पानी गर्म करें तो सिर्फ एक बड़ा सा बुलबुला बनता है. इसकी वजह खोजने पर सामने आया कि इसके लिए धरती का गुरुत्वाकर्षण जिम्मेदार है. स्पेस पर अलग तरह से पानी के उबलने से प्रेरित होकर वैज्ञानिक स्पेसक्राफ्ट के जल्दी ठंडा होने के तरीके तलाश रहे हैं.

स्पेस में पानी उबालें तो धरती से एकदम अलग अनुभव होगा. यहां उबलते पानी में सैकड़ों-हजारों बुलबुले बनते हैं, जबकि अंतरिक्ष में पानी गर्म करें तो सिर्फ एक बड़ा सा बुलबुला बनता है. इसकी वजह खोजने पर सामने आया कि इसके लिए धरती का गुरुत्वाकर्षण जिम्मेदार है. स्पेस पर अलग तरह से पानी के उबलने से प्रेरित होकर वैज्ञानिक स्पेसक्राफ्ट के जल्दी ठंडा होने के तरीके तलाश रहे हैं.

 लगभग 30 सालों के प्रयोगों से साबित हो गया कि धरती पर फलने-फूलने वाले बैक्टीरिया की तुलना में अंतरिक्ष में जर्म्स ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं और बेहद खतरनाक होते हैं. यहां पर बैक्टीरिया की अनुवांशिकता में बदलाव हो जाता है. इस पर लगातार प्रयोग भी हो रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि इनके जरिए चिकित्सा विज्ञान में कुछ नया हो सकेगा.

लगभग 30 सालों के प्रयोगों से साबित हो गया कि धरती पर फलने-फूलने वाले बैक्टीरिया की तुलना में अंतरिक्ष में जर्म्स ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं और बेहद खतरनाक होते हैं. यहां पर बैक्टीरिया की अनुवांशिकता में बदलाव हो जाता है. इस पर लगातार प्रयोग भी हो रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि इनके जरिए चिकित्सा विज्ञान में कुछ नया हो सकेगा.

 भविष्य में स्पेस में जाने की मंशा हो तो सोडा या कोक पीने का मोह एकदम छोड़ दीजिए. स्पेस में ग्रेविटी न होने की वजह से गैस के बुलबुले निष्क्रिय पड़े रहते हैं और सोडा पीने के बाद भी डकार नहीं आती है और पेट में अजीब सा अहसास होता है. एस्ट्रोनॉट्स की इसी दिक्कत को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया में स्पेस बियर पर प्रयोग चल रहे हैं.

भविष्य में स्पेस में जाने की मंशा हो तो सोडा या कोक पीने का मोह एकदम छोड़ दीजिए. स्पेस में ग्रेविटी न होने की वजह से गैस के बुलबुले निष्क्रिय पड़े रहते हैं और सोडा पीने के बाद भी डकार नहीं आती है और पेट में अजीब सा अहसास होता है. एस्ट्रोनॉट्स की इसी दिक्कत को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया में स्पेस बियर पर प्रयोग चल रहे हैं.

 अंतरिक्ष में फूलों की खुशबू एकदम बदल जाती है. यहां तापमान, आद्रर्ता और कई कारकों की वजह से पौधे से पैदा होने वाला तैलीय तत्व प्रभावित होता है, जिसका असर खुशबू पर होता है. जापान की एक परफ्यूम कंपनी ने इस दुनिया की अलग खुशबू को पकड़कर अपने एक परफ्यूम ज़ेन में लाने की कोशिश की.

अंतरिक्ष में फूलों की खुशबू एकदम बदल जाती है. यहां तापमान, आद्रर्ता और कई कारकों की वजह से पौधे से पैदा होने वाला तैलीय तत्व प्रभावित होता है, जिसका असर खुशबू पर होता है. जापान की एक परफ्यूम कंपनी ने इस दुनिया की अलग खुशबू को पकड़कर अपने एक परफ्यूम ज़ेन में लाने की कोशिश की.

 स्पेस का पसीना भी आपके पसीने ला सकता है. चूंकि यहां गुरुत्वाकर्षण नहीं होता है तो पसीना आता तो है लेकिन न तो सूखता है और न ही टपकता है. इससे पसीना जहां है, वहीं बना रहता है.

स्पेस का पसीना भी आपके पसीने ला सकता है. चूंकि यहां गुरुत्वाकर्षण नहीं होता है तो पसीना आता तो है लेकिन न तो सूखता है और न ही टपकता है. इससे पसीना जहां है, वहीं बना रहता है.

 

 

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