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11 May, 2026
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Updated Wed, 8 Dec 2021 13:57 IST
आज विवाह पंचमी है, जिसे श्रीराम विवाहोत्सव भी कहा जाता है. आज के दिन ही अयोध्या के राजुकमार भगवान श्रीराम और मिथिला की राजकुमारी सीता जी का विवाह हुआ था. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, जब सीता जी से भगवान श्रीराम का विवाह हुआ, तब मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिसके भी वैवाहिक जीवन में कोई समस्या हो या किसी के विवाह होने में कोई बाधा आ रही हो, उसे आज के दिन राम और सीता जी का विवाह कराना चाहिए. ऐसा करने से उनकी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. सुखद वैवाहिक जीवन के लिए लोग विवाह पंचमी का व्रत भी रखते हैं. आज विवाह पंचमी के अवसर पर जानते हैं कि सीता जी के विवाह के लिए जनक जी ने क्या शर्त रखी थी? इस शर्त को रखने का कारण क्या था?
राम-सीता विवाह कथा
राजा जनक की पुत्री सीता जी थीं और अयोध्या के राजा दशरथ के घर भगवान राम का जन्म हुआ था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सीता जी का जन्म धरती से हुआ था. एक बार सीता जी ने शिव जी का धनुष उठा लिया. यह देखकर राजा जनक आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि शिवजी का धनुष परशुराम जी के अतिरिक्त कोई और नहीं उठा सकता था. भगवान शिव ने परशुराम जी को अपना धनुष दिया था, जिसे परशुराम जी ने जनक जी को दिया था.
सीता जी के विवाह का समय आया तो जनक जी ने सोचा कि सीता से उसका ही विवाह हो सकता है, जो भगवान शिव के इस धनुष को उठा लेगा क्योंकि सीता जी ने उस धनुष को उठाया था. जनक जी ने सीता जी के स्वयंवर की घोषणा कर दी और सीता जी से विवाह के लिए शिव धनुष उठाने की शर्त रख दी. जो इस शर्त को पूरा करता, उसी के गले में सीता जी वरमाला डालतीं.
सीता जी के स्वयंवर की सूचना महर्षि वशिष्ठ जी को भी हुई, तो वे भगवान राम और लक्ष्मण को लेकर मिथिला की राजधानी जनकपुर पहुंच गए. सीता जी के स्वयंवर में अनेकों राजकुमार आए हुए थे. महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम और लक्ष्मण जी के साथ महल में स्थान ग्रहण किया. बारी-बारी से सभी राजकुमारों ने शिव धनुष उठाने का पूरा प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हुए.
जनक जी यह देखकर बहुत ही निराश हो गए कि कोई शिव धनुष उठा ही नहीं पा रहा. तब उन्होंने भरी सभा में कहा कि क्या उनकी बेटी के लिए कोई योग्य राजकुमार नहीं है. तब महर्षि वशिष्ठ ने रामजी को शिव धनुष उठाने की आज्ञा दी. तब प्रभु राम ने अपने गुरु को प्रणाम किया और शिव धनुष को एक हाथ से उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे, तभी वह धनुष टूट गया. यह देखकर जनक जी खुश हुए और सीता जी ने प्रभु राम के गले में वरमाला पहना दीं. फिर राम और सीता जी का विधिपूर्वक विवाह कराया गया.
शिव धनुष के टूटने से परशुराम जी बहुत क्रोधित हुए और वे स्वयंवर में पहुंच गए. जब प्रभु राम से उनका परिचय हुआ, तो वे समझ गए कि ये कोई और नहीं भगवान विष्णु ही हैं. फिर वे वहां से चले गए.







