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10 May, 2026
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Updated Sat, 10 Jul 2021 14:41 IST
दिल्ली उच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता पर टिप्पणी की है कि सरकार को समान क़ानून के दिशा में सोचना चाहिए. इस टिप्पणी के आते ही राजनीतिक हल्के में एक बहस का वातावरण निर्मित होने लगा. एक तरफ़ समाज का वो वर्ग था, जिन्हें मत-संप्रदायों के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता, वो इसे हर वर्ग समुदाय की बेहतरी के तौर पर देख रहे हैं. वहीं, एक वर्ग जो आज भी उसी दक़ियानूसी पुराने कट्टर सोच की जकड़न में बंधा है, वह इसका विरोध करने लगा.
आख़िर ये समान नागरिक संहिता है क्या? समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है, भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो. समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक, जमीन-जायदाद की विरासत एवं बच्चा गोद लेना इन सभी विषयों के सम्बंध में देश में एक क़ानून का निर्माण हो, जो सभी मत- संप्रदायों पर समान रूप से लागू होंगे.
क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड की माँग आज की है? इसकी संवैधानिक स्थिति क्या है? इस पर भी हमें जान लेना चाहिए. समान नागरिक संहिता पर बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान निर्माण की प्रारूप समिति “ड्राफ़्टिंग समिति” में 23 नवम्बर 1948 को विषय रखा, जिस पर चर्चा हुई. उस समय ये आर्टिकल 35 के रूप में था, जिसे बाद में सविधान के चौथे खंड के 44 अनुच्छेद के रूप में स्वीकार किया गया, जो राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत हैं.
आधी आबादी के अधिकारों के लिए बिल लाना चाहते थे डॉ अंबेडकर...
डॉ अंबेडकर देश की आधी आबादी जो महिलायें हैं, उनको उनके अधिकार देने हेतु ये बिल लाना चाहते थे, लेकिन फिर उन्होंने ने ही कहा कि इस पर एक राय बनाकर उचित समय पर इसे लागू किया जाना चाहिए, आप देखें कि गोवा में तो 50 के दशक में ही लागू हो गया था, लेकिन भारत में ये क़ानून रूप में लागू नहीं हो पाया. भारत में हिंदू कोड बिल को तो लागू किया गया हिंदू समाज ने उसे स्वीकार भी कर लिया, लेकिन वही मुस्लिम समाज ही सबसे ज़्यादा बढ़ चढ़ कर इस यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध कर रहा है.
अगर महिला को बिना मत- सम्प्रदाय के भेद किए बिना अपनी इच्छ से विवाह करने, बच्चा गोद लेने, स्वेच्छा से तलाक़ लेने, अपने पिता की सम्पत्ति में उनका अधिकार, ये क्या उनको नहीं मिलने चाहिए? यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर समय – समय पर न्यायालयों के द्वारा टिप्पणी की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने के संबंध में अप्रैल 1985 में पहली बार सुझाव दिया था.







