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समान नागरिक संहिता देश की आवश्यकता

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Updated Sat, 10 Jul 2021 14:41 IST

समान नागरिक संहिता देश की आवश्यकता

दिल्ली उच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता पर टिप्पणी की है कि सरकार को समान क़ानून के दिशा में सोचना चाहिए. इस टिप्पणी के आते ही राजनीतिक हल्के में एक बहस का वातावरण निर्मित होने लगा. एक तरफ़ समाज का वो वर्ग था, जिन्हें मत-संप्रदायों के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता, वो इसे हर वर्ग समुदाय की बेहतरी के तौर पर देख रहे हैं. वहीं, एक वर्ग जो आज भी उसी दक़ियानूसी पुराने कट्टर सोच की जकड़न में बंधा है, वह इसका विरोध करने लगा.

आख़िर ये समान नागरिक संहिता है क्या? समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है, भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो. समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक, जमीन-जायदाद की विरासत एवं बच्चा गोद लेना इन सभी विषयों के सम्बंध में देश में एक क़ानून का निर्माण हो, जो सभी मत- संप्रदायों पर समान रूप से लागू होंगे.

क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड की माँग आज की है? इसकी संवैधानिक स्थिति क्या है? इस पर भी हमें जान लेना चाहिए. समान नागरिक संहिता पर बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान निर्माण की प्रारूप समिति “ड्राफ़्टिंग समिति” में 23 नवम्बर 1948 को विषय रखा, जिस पर चर्चा हुई. उस समय ये आर्टिकल 35 के रूप में था, जिसे बाद में सविधान के चौथे खंड के 44 अनुच्छेद के रूप में स्वीकार किया गया, जो राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत हैं.

आधी आबादी के अधिकारों के लिए बिल लाना चाहते थे डॉ अंबेडकर...

डॉ अंबेडकर देश की आधी आबादी जो महिलायें हैं, उनको उनके अधिकार देने हेतु ये बिल लाना चाहते थे, लेकिन फिर उन्होंने ने ही कहा कि इस पर एक राय बनाकर उचित समय पर इसे लागू किया जाना चाहिए, आप देखें कि गोवा में तो 50 के दशक में ही लागू हो गया था, लेकिन भारत में ये क़ानून रूप में लागू नहीं हो पाया. भारत में हिंदू कोड बिल को तो लागू किया गया हिंदू समाज ने उसे स्वीकार भी कर लिया, लेकिन वही मुस्लिम समाज ही सबसे ज़्यादा बढ़ चढ़ कर इस यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध कर रहा है.

अगर महिला को बिना मत- सम्प्रदाय के भेद किए बिना अपनी इच्छ से विवाह करने, बच्चा गोद लेने, स्वेच्छा से तलाक़ लेने, अपने पिता की सम्पत्ति में उनका अधिकार, ये क्या उनको नहीं मिलने चाहिए? यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर समय – समय पर न्यायालयों के द्वारा टिप्पणी की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने के संबंध में अप्रैल 1985 में पहली बार सुझाव दिया था.

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाईबी. चन्द्रचूड की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने तलाक और गुजारा भत्ता जैसे महिलाओं से जुड़े मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में देश में समान नागरिक संहिता बनाने पर विचार करने को कहा था. वर्तमान में फिर से दिल्ली उच्च न्यायलय ने भी सर्वोच्च न्यायलय की ही बात की. अब समझे की यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से होगा क्या?. समान नागरिक संहिता शादी और तलाक के मामले में हर मतावलंबियों पर एक ही क़ानून लागू होगा.
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर मतावलंबियों के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा, जैसे हिंदुओं को दो पत्नियां रखने की इजाजत नहीं, वैसे मुस्लिमों को भी चार शादियों की इजाजत नहीं मिलेगी. इस समय देश में मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है. इस धर्म के लोग शादी- विवाह, संपत्ति और गोद लेने में अपने पर्सनल लॉ का पालन करते हैं. जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं.
 
क्‍या समान रूप से महिलाओं को मिल सकेगा न्‍याय?
समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी महिलाओं को समान रूप से न्याय मिलेगा तथा आपसी असंतोष की स्थिति में कमी आएगी. देश में न्याय व्यवस्था को स्थापित करने में मदद मिलेगी. समानता के अधिकार की वास्तविक प्रतिपूर्ति इसके पश्चात ही सम्भव होगी, जिसमें देश के सभी महिलाओं को जीवन जीने की स्वतंत्रता का समान अधिकार होगा. लोगों का जनमानस भी अब किंचित व्यापक हुआ है, इसलिए सिविल कोड को लागू करने का यह उपयुक्त समय है.
इसलिए, सरकार को 23 नवम्बर 2021 तक इस पर क़ानून लाना चाहिए. 23 नवम्बर इसलिए क्योंकि इसी दिन डा अंबेडकर ने 1948 में इसे ड्राफ़्टिंग कमेटी के सामने चर्चा के लिए रखा था. यूनिफॉर्म सिविल कोड का देश में लागू होना बाबा साहब अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
 

 

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