• Sun, 10 May, 2026
जापान की अमेरिका के साथ इस नजदीकी से बढ़ी चीन-रूस की टेंशन

ताज़ा खबरें

Updated Thu, 30 Dec 2021 12:50 IST

जापान की अमेरिका के साथ इस नजदीकी से बढ़ी चीन-रूस की टेंशन

टोक्यो. चीन और रूस को एक साथ झटका देने के लिए जापान ने अपने पुराने दुश्मन अमेरिका से दोस्ती बढ़ा ली है. क्योडो न्यूज़ एजेंसी ने जापान के सरकारी सूत्रों के हवाले से बड़ा खुलासा किया है. एजेंसी ने बताया कि टोक्यो और वॉशिंगटन ने एक संयुक्त योजना का मसौदा तैयार किया है. इस मसौदे के तहत जापान के दक्षिण-पश्चिम में नैनसी द्वीप श्रृंखला पर एक सैन्य अड्डे का निर्माण किया जाएगा. इसका इस्तेमाल ताइवान में आपात स्थितियों से निपटने के लिए होगा. ऐसे में चीन और रूस की टेंशन बढ़ सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और जापान के बीच वॉशिंगटन में 7 जनवरी को विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक हो रही है. इस बैठक में इस योजना पर औपचारिक सहमति बनाए जाने की संभावना है. योजना के तहत, ‘अमेरिकी सैनिक शुरुआत में नैनसी द्वीप पर (जिसे रयुक्यु द्वीप के नाम से भी जाना जाता है) एक अस्थायी अड्डा बनाएंगे. यह दक्षिण-पश्चिम में ताइवान की तरफ जाने वाली द्वीपों की श्रृंखला में पहला अड्डा होगा. इन 200 द्वीपों में करीब़ 40 द्वीपों को संभावित स्थलों की सूची में रखा गया है.’

यह रिपोर्ट जापान संसद के रक्षा बजट में इज़ाफे के भी एक दिन बाद आई है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान द्वारा पहली बार रक्षा बजट में इतनी बड़ी वृद्धि की अनुमति दी गई है. अब यह देखना बाकी है कि जापान की सरकार युद्ध संबंधी संवैधानिक संशोधन के लिए कितना दबाव बनाती है. इस संशोधन के ज़रिए जापान को युद्ध शुरू करने का अधिकार हासिल हो जाएगा.

सात दशक पहले अमेरिका ने जापान पर यह शांतिवादी संविधान थोपा था. यह संविधान अमेरिका के जनरल मैकआर्थर की छोटी सी टीम ने सिर्फ एक हफ़्ते में तैयार किया था. जनरल मैकआर्थर, मित्र शक्तियों के सर्वोच्च सेनानायक थे.

जापान का सैन्यकरण आधुनिक इतिहास का तथ्य है. महामंदी ने जापान को बहुत बुरे तरीके से प्रभावित किया था और वहां सैन्यवाद के उभार को बढ़ावा दिया था. सीधे शब्दों में कहें तो ज़्यादा प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करने के लिए जापान अपना विस्तार करना चाहता था. तब और अब की स्थितियों में बहुत सारी समानताएं और असमानताएं हैं.

मुख्य अंतर यह है कि 20वीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी ताकतों द्वारा वैश्विक आधुनिकीकरण की लहर से जापान नाखुश था, जिसके चलते कई देशों को गुलाम बना लिया गया था और जिसके प्रभाव एशिया में महसूस किए गए थे.

बीजिंग और मॉस्को, जापान के कदमों से बहुत ज़्यादा चिंतित नज़र नहीं आते हैं, लेकिन वे इसके ऊपर नज़र बनाए हुए हैं, क्योंकि भूराजनीतिक वास्तविकता यह है कि अगर जापान का सैन्यकरण होता है, तो उसका जुड़ाव अमेरिका की चीन और रूस विरोधी “हिंद-प्रशांत” रणनीति से भी होगा.

 

Latest news