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11 May, 2026
राज्य
Updated Sat, 1 May 2021 11:45 IST
बहुत कम लोगों ने कभी इस बारे में भी सोचा होगा कि उन्हें अब एक व्यक्ति के रूप में भी अपने प्रधानमंत्री के बारे में कुछ ऐसा जानना चाहिए जो मार्मिक हो, अंतरंग हो, ऐसा निजी हो जिसे साहस के साथ सार्वजनिक रूप से व्यक्त और स्वीकार किया गया हो। कुछ जानने की इच्छा का बहुत सारा सम्बन्ध इस बात से भी होता है कि आम नागरिक अपने नायक को लेकर किस तरह की आसक्ति अथवा भय का भाव रखते हैं।
आज़ादी के बाद की स्मृतियों में अब तक के सबसे बड़े नागरिक संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी क्या संवेदनात्मक रूप से उतने ही विचलित हैं जितने कि उनके करोड़ों देशवासी हैं? क्या प्रधानमंत्री के चेहरे पर अथवा उनकी भाव-भंगिमा में ऐसा कोई आक्रोश या पश्चाताप नज़र आता है कि उनके नेतृत्व में कहीं कोई बड़ी चूक हो गई है जिसकी क़ीमत शवों की बढ़ती हुई संख्या के रूप में नागरिक श्मशान घाटों पर चुका रहे हैं? संसद की बैठकों की अनुपस्थिति में सरकार के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव पारित करने के आरोप में सजा कितने लोगों को दी जा सकेगी? पूरे देश को ही जेलों में डालना पड़ेगा ! अभी अस्पताल छोटे पड़ रहे हैं फिर जेलें कम पड़ जाएँगी !
किसी भी ऐसे राष्ट्राध्यक्ष का, जो प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं के पालन में ‘राष्ट्रधर्म’ जैसा यक़ीन रखता हो, मज़बूत रहना निश्चित ही ज़रूरी भी है। जितना बड़ा राष्ट्र, मज़बूती की ज़रूरत भी उतनी ही बड़ी। इस मज़बूती का सम्बन्ध उम्र से कम और मन की बात और मन की अवस्था से ज़्यादा है। हाल ही में अमेरिका के नए राष्ट्रपति अपने विशेष विमान की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए दो-तीन बार लड़खड़ा गए थे। वे गिरे नहीं। अपनी अठहत्तर साल की उम्र के बावजूद ऐसा नहीं लगने दिया कि वे अशक्त हैं। सीढ़ियां चढ़ ऊपर पहुँचने के बाद उन्होंने अपने चिर-परिचित आत्म विश्वास के साथ पीछे मुड़कर उन लोगों का अभिवादन किया जो उन्हें विदा देने पहुँचे थे।
बहुत कम लोगों ने कभी इस बारे में भी सोचा होगा कि उन्हें अब एक व्यक्ति के रूप में भी अपने प्रधानमंत्री के बारे में कुछ ऐसा जानना चाहिए जो मार्मिक हो, अंतरंग हो, ऐसा निजी हो जिसे साहस के साथ सार्वजनिक रूप से व्यक्त और स्वीकार किया गया हो। कुछ जानने की इच्छा का बहुत सारा सम्बन्ध इस बात से भी होता है कि आम नागरिक अपने नायक को लेकर किस तरह की आसक्ति अथवा भय का भाव रखते हैं। इसके उलट यह भी है कि नायक की आँखों और उसके हाव-भाव में ऐसा क्या है जो उसकी एक क्रूर अथवा नाटकीय शासक की छवि से भिन्न हो सकता है !
नरेंद्र मोदी में निश्चित ही किसी नेहरू की तलाश नहीं की जा सकती। की भी नहीं जानी चाहिए। पर उस नरेंद्र मोदी की तलाश अवश्य की जानी चाहिए जिसके बचपन से प्रारम्भ होकर प्रधानमंत्री बनने तक की लम्बी कहानी के बीच के बहुत सारे पात्र और क्षण छूटे हुए होंगे।

भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोर को उनके सानिध्य में बिना किसी भय अथवा संकोच के खड़े हुए देखकर उनके अनछुए व्यक्तित्व के प्रति दो तरह की जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती हैं : पहली तो यह कि प्रधानमंत्री का पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम क्या प्राकृतिक है? क्या वह पहले भी कभी इसी प्रकार से व्यक्त या अभिव्यक्त हो चुका है? दूसरा यह कि अपनी दूसरी तमाम व्यस्तताओं के बीच इस तरह का समय पक्षियों के लिए कैसे निकाल पाते होंगे?
देश और दुनिया की बदलती हुई परिस्थितियों में नागरिकों के लिए अब ज़रूरी हो गया है कि वे अपने नायकों की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से अलग उनके/उनमें मानवीय गुणों और संवेदनाओं की तलाश भी करें।

ऐसा इसलिए कि अब जो निश्चित है वह केवल नागरिकों का कार्यकाल ही है, शासकों का नही। शासकों ने तो इच्छा-सत्ता का स्व-घोषित वरदान प्राप्त कर लिया है। नागरिक जब अपने शासकों को उनकी पीड़ाओं, संघर्षों, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं की परतें उघाड़कर जान लेते हैं तो वे अपने आपको उस भविष्य के साथ जीने अथवा न जीने के लिए तैयार करने लगते हैं जो व्यवस्था के द्वारा तय किया जा रहा है।
क्योंकि नागरिकों को अच्छे से पता है कि ऑक्सिजन की कमी या साँसों का अभाव सिर्फ़ उनके ही लिए है, शासक तो बड़े से बड़े संकट से भी हमेशा सुरक्षित बाहर निकल आते हैं। वर्तमान संकट का समापन भी ऐसा ही होने वाला है।







