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RTI से हुआ खुलासा, भारत में बचे हैं सिर्फ 12 सरकारी बैंक, 2118 शाखाएं बंद हुईं

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Updated Mon, 10 May 2021 14:20 IST

RTI से हुआ खुलासा, भारत में बचे हैं सिर्फ 12 सरकारी बैंक, 2118 शाखाएं बंद हुईं

भारतीय रिजर्व बैंक में लगाई गई RTI में खुलासा हुआ है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में 10 सरकारी बैंकों की कुल 2,118 बैंकिंग शाखाएं या तो बंद हो चुकी हैं या इन्हें दूसरी बैंक शाखाओं में मिला दिया गया है। नीमच के RTI कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ की RTI पर रिजर्व बैंक ने यह जानकारी दी है। सबसे ज्यादा बैंक ऑफ बड़ौदा की 1,283 शाखाएं बंद हुई हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के अलावा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 332, पंजाब नेशनल बैंक की 169, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की 124, केनरा बैंक की 107, इंडियन ओवरसीज बैंक की 53, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की 43, इंडियन बैंक की पांच और बैंक ऑफ महाराष्ट्र एवं पंजाब एंड सिंध बैंक की एक-एक शाखा बंद हुई है। इस दौरान बैंक ऑफ इंडिया और यूको बैंक की कोई भी शाखा बंद नहीं हुई है।

देश में अब सिर्फ 12 सरकारी बैंक

 

 

केन्द्र सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर इन्हें चार बड़े बैंकों में मिला दिया था। इसके बाद देश में सिर्फ 12 सरकारी बैंक बचे हैं। महाविलय के तहत एक अप्रैल 2020 से ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को पंजाब नेशनल बैंक में, सिंडिकेट बैंक को केनरा बैंक में, आंध्रा बैंक व कॉरपोरेशन बैंक को यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में और इलाहाबाद बैंक को इंडियन बैंक में मिला दिया गया था।

बैंकों में नहीं हो रही हैं नई भर्तियां

 

 

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के महासचिव सीएच वेंकटचलम ने इस मामले पर कहा "सरकारी बैंकों की शाखाओं का घटना भारत के बैंकिग उद्योग के साथ ही घरेलू अर्थव्यवस्था के हित में भी नहीं है तथा बड़ी आबादी के मद्देनजर देश को बैंक शाखाओं के विस्तार की जरूरत है। 'सरकारी बैंकों की शाखाएं घटने से बैंकिंग उद्योग में नये रोजगारों में भी लगातार कटौती हो रही है जिससे कई युवा मायूस हैं। पिछले तीन साल में सरकारी बैंकों में नयी भर्तियों में भारी कमी आई है।

देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए बैंकों का विलय जरूरी

 

 

अर्थशास्त्री जयंतीलाल भंडारी बैंकों के विलय को लेकर अलग राय रखते हैं। उनका कहना है कि 'देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए हमें छोटे आकार के कमजोर सरकारी बैंकों के बजाय बड़े आकार के मजबूत सरकारी बैंकों की जरूरत है।'

 

 

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