Sun,
10 May, 2026
राज्य
Updated Sat, 15 May 2021 0:19 IST
पहली बार अंतरिक्ष (Space) में लंबी यात्राओं के लिए गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं. मंगल पर बहुत सारे अभियान जा चुके हैं तो वहां पर मानव अभियानों (Long Human Mission) की तैयारी चल रही है. लेकिन इसके लिए हमारी परंपरागत रॉकेट तकनीक काफी नहीं है. हाल ही में अमेरिका की डिफेंस एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी (DARPA) ने तीन निजी कंपनियों को आणविक विखंडन ऊष्मा रॉकेट विकसित करने की जिम्मेदारी दी है. आने वाले समय में हम अब रॉकेट संचालन की नई तकनीकें देखने वाले हैं.

डारपा (DARPA) का यह प्रयास रॉकेट संचालन (Rocket Propulsion) तकनीकों में से केवल एक ही तकनीक के लिए है. लेकिन इसके अलावा आने वाले समय में बहुत सी तकनीकें देखने को मिलने वाली है. फिलहाल रॉकेट संचालन के लिए रासायनिक रॉकेट (Chemical Rocket) का उपयोग होता है जिसमें तरल ईंधन और ठोस ईंधन के विकल्प हैं. इसमें तरल हाइड्रोजन या एल्यूमीनियम पाऊडर जैसे ईंधन का ऑक्सीजन जैसे ऑक्सीडाइजर से प्रतिक्रिया होती है और अत्याधिक दबाव वाली गैस इंजन के नोजल से निकलती है जिसके जोर से रॉकेट आगे बढ़ता है.

रॉकेट इंजन (Rocket Engine) की कार्यक्षमता बढ़ाने के कई कारक होते हैं जिसे वैज्ञानिक लगातार काम कर रहे हैं. हाल ही में एलन मस्क (Elone Musk) की स्पेस एक्स कंपनी न अपने स्टारशिप लॉन्चर के परीक्षण किए जो राप्टर (Rapter) नाम के फुल फ्लो स्टेज्ड कंबशन (FFSC) इंजन का उपयोग कर रहा है. इसमें मीथेन और ऑक्सीजन का रासायनिक क्रिया के लिए उपयोग होता है. इस तरह के इंजनों का रूसियों ने 1060 के दशक में और अमेरिकियों ने 2000 के दशक में परीक्षण किया था, लेकिन अंतरिक्ष उड़ाने के लिए इसका उपयोग नहीं हुआ था. ये इंजन ज्यादा ईंधन कारगरता वाले हैं और ज्यादा जोर-भार के अनुपात वाले हैं.

विखंडन ऊष्मा रॉकेट (Fission Thermal Rocket) नाभकीय विखंडन की प्रक्रिया पर आधारित होते हैं जिनसे बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है जिसे नियंत्रित करना बहुत मुश्किल होता है. इन रॉकेट में ईंधन के रूप में हाइड्रोजन को इतना नाभकीय विखंडन (Nuclear Fission) के द्वारा उच्च तापमान तक गर्म किया जाता है जिससे रिएक्टर चेंबर में बहुत दबाव पैदा होता है जो रासायनिक रॉकेट की तरह केवल रॉकेट नोजल से निकलता है जिसके जोर से रॉकेट ऊपर जाता है. ये रॉकेट पृथ्वी (Earth) से अंतरिक्ष तक जाने के लिए नहीं बल्कि अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद बहुत ही कारगर होते हैं.

विखंडन ऊष्मा रॉकेट (Fission Thermal Rocket) कभी अंतरिक्ष में नहीं उड़े हैं लेकिन उनका धरती पर परीक्षण जरूर हुआ है. ये पृथ्वी और मंगल के बीचत की उड़ान को सात महीने से करीब तीन महीने की करने में सक्षम होते हैं. लेकिन इनके साथ समस्या रोडियोधर्मी कचरे (Radioactive Waste) की है.इसके अलावा इसकी नाकामी बहुत ही बड़े इलाके में रेडियोधर्मी पदार्थ फैला सकती है. इतना ही नहीं इनके लिए बहुत ही संकुचित किस्म का विखंडन रिएक्टर (Neuclaer Reactor) बनाना होगा जो बड़ी चुनौती है.

विद्युत संचालक रॉकेट (Electric propulsion Rocket) भी एक नई तकनीक है जिसका उपयोग व्यापक तो नहीं, फिर भी हो रहा है. इसमें विद्युत क्षेत्र (Electric Field) का उपयोग कर आयनीकृत कणों का त्वरण बढ़ाकर उन्हें थर्स्टर के जरिए दागा जाता है. इसमें जिनोन गैस को संचालक (Propellant) के तौर पर उपयोग में लाया जाता है जो भारी तत्व होता है और आसानी से आवेशित भी हो जाता है. ये कण थर्स्टर से निकल कर अंतरिक्ष यान को आवेग प्रदान करते हैं. अगर तेज गति की दरकार ना हो तो सौर ऊर्जा से संचालित ये रॉकेट ऊर्जा के लिहाज से बहुत ही कारगर होते हैं.

जिसतरह से हमारे समुद्र में सदियों से पाल (Sails) वाली नौकाओं का उपयोग किया जाता रहा है जहां हवा पाल को आगे बढ़ाती है. उसी तरह से सौर पाल (Solar Sails) संचालन अलग तकनीक है जो पूरी तरह से सूर्य (Sun) से निकलने वाली प्रकाश (Light) की किरणें और विकिरण पर निर्भर होती है. प्रकाश के फोटोन का भार तो नहीं होता है लेकिन फोटोन की ऊर्जा एक बहुत ही विशाल पाल को धक्का लगाने के लिए काफी हो सकते हैं. इसकी गति सूर्य से दूरी पर निर्भर करती है.इस तकनीक का जापान के IKAROS अंतरिक्ष यान ने शुक्र ग्रह के पास तक जाने में सफलता पूर्वक उपयोग किया है. इसके अवासा लाइटसेल-2 नाम का यान भी पृथ्वी का चक्कर लगाने में इस तकनीक का उपयोग कर रहा है.







