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03 Mar, 2026
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Updated Sun, 21 Nov 2021 21:20 IST
भारत में विज्ञान (Indian Science) को नई ऊंचाइयां देने का काम करने वाले डॉ सीवी रमन (CV Raman) वैज्ञानिक के साथ ही एक महन शिक्षक भी थे. उन्हें दुनिया को रमन प्रभाव (Raman Effect) देने के लिए ज्यादा जानती है. डॉ सीवी रमन को नेबोल पुरस्कार उनके जीवन के आधे पड़ाव पर ही मिल गया था, लेकिन उसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन देश में विज्ञान और उसकी शिक्षा के लिए लगा दिया. और हमेशा ही एक कर्मठ और समर्पित वैज्ञानिक, शिक्षक, और देशभक्त के रूप में कार्य करते रहे. 21 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि पर देश उनके योगदान को याद कर रहा है.
बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे रमन
7 नवंबर 1888 को मद्रास प्रेसिडेंसी के तिरुचिरापल्ली जन्में चंद्रशेखर वेंकट रमन बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे. स्नातक होने के बाद पहले उन्हंने ध्वनिकी और प्रकाशिकी पर कार्य किया और फिर लंदन से लौटते समय उन्हें रमन प्रभाव की खोज की प्रेरणा मिली. जिसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार का सम्मान मिला. जिसके बाद उन्होंने प्रकाश के पदार्थ माध्यमों पर प्रभाव पर अध्ययन जारी रखा.
विज्ञान संस्थानों की स्थापना
लेकिन रमन उन वैज्ञानिकों में से नहीं थे जो केवल अपने प्रयोगों में ही डूबे रहते. नोबेल पुरस्कार से पहले ही उन्होंने 1926 में इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स की शुरुआत की. इसके बाद साल 1933 में बेंगलुरू में भारतीय विज्ञान संस्थान के पहले निदेशक का पद संभाला और उसी साल भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थापना भी की. 1948 में भारतीय विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत्त होने के एक साल बाद उन्होंने बेंगलुरू में ही रमन अनुसंधान संस्थान की स्थापना की और 1970 तक उसी में में सक्रिय रहे.
विशेष पत्थरों की कलेक्शन
रमन ने जीवनभर कई खास पत्थर, खनिज और अन्य पदार्थ जमा किए जिन्हें उन्होंने प्रकाश प्रकीर्णन गुणों के लिए एकत्र किया था जिनमें से कुछ उन्होंने खुद तलाश किए थे तो कुछ उन्हें उपहार में मिले थे. वे अपने साथ हमेशा एक छोटा स्पैक्ट्रोस्कोप रखा करते थे. यह स्पैक्ट्रोस्कोप आज भी आईआईएससी में देखा जा सकता है.
प्रकाश के अलावा भी बहुत से विषयों पर शोध
बहुत कम लोग जानते हैं कि डॉ सीवी रमन ने प्रकाशकी के अतिरिक्त भी बहुत से विषयों पर शोध किया था. रमन प्रभाव से पहले उन्होंने ध्वनिकी और भारतीय वाद्ययंत्रों के विज्ञान पर बहुत कार्य किया था. बाद में उन्होंने बहुत सारे लोगों के साथ अलग अलग शोधकार्य किए. उन्होंने फोटोन के स्पिन पर भी कार्य किया था जिससे बाद में प्रकाश के क्वांटम स्वभाव को सिद्ध किया जा सका. बाद में अन्य शोध के अलावा उन्होंने फूलों के रंगों के जैविक गुणों के अलावा मानव दृष्टि पर भी काम किया था.
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस
डॉ सीवी रमन को 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. 28 फरवरी 1928 को उन्होंने रमन प्रभाव की खोज की थी और उसी दिन को भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है. खगोल वैज्ञानिक सुब्रमण्यम चंद्रशेखर सीवी रमन के भतीजे थे जिन्हें 1983 में भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था. वहीं रमन के वैज्ञानिक जीवन में लॉर्ड रदरफोर्ड का बहुत योगदान था. उन्होंने ही सीवी रमन को नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया था और 1932 में भारतीय विज्ञान संस्थान के निदेशक पद के लिए उनकी अनुशांसा की थी.
जब डॉक्टरों ने दे दिया था जवाब
अक्टूबर 1970 के अंत में हृदयाघात के कारण वे अपनी प्रयोगशाला में गिर पड़े. उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया जहां उनके हालत देखकर डॉक्टरों ने जबाव देते हुए कहा था कि अब उनके पास चार घंटों से भी कम का समय बचा है. लेकिन वे इसके बाद कई दिन तक जिंदा रहे. उन्होंने तब कहा था कि उन्हें इंस्टीट्यूट के बागीजे में अपने साथियों के साथ रहने की इजाजत दी जाए.
अपने अंतिम समय के दो दिन पहले उन्होंने अपने पूर्व छात्रों से कहा था कि वे एकेडमी के जर्नल को खत्म ना होने दें, क्योंकि वे देश में किए जा रहे विज्ञान के कार्यों की गुणवत्ता के संवेदनशील संकेतक हैं. उन्होंने अपने पत्नी के नाम वसीयत में कहा था कि उनका अंतिम संस्कार सादगी से किया जाए. 21 नवंबर 1970 को उन्होंने 82 साल की उम्र में अंतिम सांस ली.







