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10 May, 2026
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Updated Tue, 27 Jul 2021 15:40 IST
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच गठजोड़ की सुगबुगाहट दिखने लगी है. कृषि कानून विरोधी आंदोलन से मिली संजीवनी के बाद राष्ट्रीय लोक दल ने अपनी ताकत बढ़ाते जाने का पूरा खाका तैयार कर लिया है. सहयोगी दल सपा को विश्वास में लेकर भाईचारा सम्मेलन भी शुरू कर दिया. इसकी शुरुआत 27 जुलाई यानी आज खतौली (मुजफ्फरनगर) से हो गई है. बाद में अन्य जिलों में भी ऐसे ही सम्मेलनों का आयोजन किया जाएगा. रालोद ने किसानों के मुद्दे पर सभी जातियों को जोड़ने का अभियान शुरू कर दिया है.
विधानसभा चुनाव 2022 का बिगुल फूंका
यूपी चुनावों से पहले सपा ने यह ऐलान कर दिया है कि वह किसी बड़ी पार्टी के साथ गठजोड़ नहीं करेगी. छोटे दलों को जोड़ने की रणनीतिक पहल भी पार्टी ने की है. इसके बाद ही अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की मुलाकात हुई. वेस्ट यूपी के अधिकतर जिलों में रालोद की पकड़ को देखते हुए ही अखिलेश और जयंत की मुलाकात के रणनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. इसी को लेकर राष्ट्रीय लोकदल ने अखिलेश यादव से बातचीत के बाद विधानसभा चुनाव 2022 का बिगुल फूंक दिया है. सभी वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने किसान और मजदूर का एजेंडा लेकर लोगों के बीच जाने के कार्यक्रम शुरू कर दिया है.
भाईचारा सम्मेलन आयोजित
राष्ट्रीय लोक दल का आज खतौली में एक भाईचारा सम्मेलन आयोजित किया गया. इस सम्मेलन के जरिए राष्ट्रीय लोक दल ने अपना विधानसभा चुनाव 2022 का एजेंडा शुरू कर दिया है. रालोद, समाजवादी पार्टी गठबंधन का हिस्सा होगा इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें तेज हो गई हैं क्योंकि समाजवादी पार्टी पहले ही घोषणा कर चुकी है कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल सहित कई छोटे दलों को साथ लेकर समाजवादी पार्टी मैदान में उतरेगी.
पंचायत चुनाव में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़े
पिछले दिनों पंचायत चुनाव में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के साथ मिलकर चुनाव लड़े राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने भी समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बनाया है.
मजदूर और किसानों को अपनी ओर करने की कवायद
विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की कमियों को उजागर कर तीन कृषि बिल के जरिए किसानों और महंगाई के मुद्दों को लेकर मजदूरों को अपनी और आकर्षित करने का काम करेगी. कोरोना काल के दौरान हुई मजदूरों की मौत और सैकड़ों दूर से पैदल चलकर अपने गांव लौटे गरीब मजदूरों को भी विपक्षी पार्टी मुद्दा बना सकती है.
उत्तर प्रदेश में सरकार की कमियों को हथियार बनाकर मैदान में उतरने वाले राजनीतिक दलों को कहीं ना कहीं लोगों की सरकार से नाराजगी का लाभ जरूर मिलेगा. वहीं 3 कृषि बिल के विरोध में 7 माह से भी ज्यादा बीतने के बाद किसान वहां से हटने को तैयार नहीं है. इस बात से भी साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि कहीं ना कहीं सरकार से किसान नाराज हैं, जिसका लाभ भी राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी गठबंधन को मिल सकता है.
वेस्ट यूपी की विधानसभा सीटों पर रालोद का प्रभाव
आपको बता दें कि वेस्ट यूपी के लगभग दो दर्जन जिलों की 50 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर रालोद का प्रभाव माना जाता है. ऐसे में चुनाव पूर्व भाईचारा सम्मेलन जैसे आयोजनों से वेस्ट यूपी की सियासत में हलचल स्वाभाविक है.







