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अफगानिस्तान में तालिबान के 100 दिन, इन चुनौतियों का कैसे करेगा सामना?

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Updated Thu, 25 Nov 2021 22:36 IST

अफगानिस्तान में तालिबान के 100 दिन, इन चुनौतियों का कैसे करेगा सामना?

काबुल. अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के 100 दिन पूरे हो गए हैं. इस दौरान उसने यह सबक भी सीख लिया है कि किसी शासन को हटाकर देश पर कब्जा करना आसान है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाना नहीं. फिलहाल सूचना आई है कि 11 देशों ईरान, पाकिस्तान, चीन, रूस, तुर्की, कतर, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाखिस्तान, किर्गिस्तान, इटली और संयुक्त अरब अमीरात ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास खोले हैं. तालिबान अभी अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए कोशिशों में जुटा है. फिलहाल ये देश बढ़ती भुखमरी, अपराध, नकदी की कमी से गहराते आर्थिक संकट और इस्लामिक स्टेट (ISIS-K in Afghanistan) के घातक हमलों का सामना कर रहा है.

तालिबान सरकार के अधिकारियों ने रिश्ते बनाने और देश के हालात पर बातचीत के लिए कई क्षेत्रीय और दूर के देशों का दौरा किया है. जिसके बाद कम से कम छह देशों के प्रतिनिधियों ने अफगानिस्तान का दौरा कर तालिबानी नेतृत्व के साथ बैठकें कीं. इन 100 दिनों के भीतर अफगानिस्तान में छह महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बैठक हुई हैं. अफगानिस्तान के मसले पर ईरान, पाकिस्तान, भारत, रूस और चीन ने बैठकों का आयोजन किया है. इसके अलावा जी-20 देश के नेताओं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी अफगानिस्तान के हालातों पर चर्चा की गई है.

तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर किया था कब्जा
बता दें कि तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्ज़ा किया था. उस दिन अमेरिकी हथियारों से लैस तालिबान के लड़ाके राष्ट्रपति भवन में दाखिल हुए थे. इसके कुछ देर पहले तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने एक छोटा सा भाषण दिया और देश के बाहर चले गए. तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों की सेनाओं की वापसी के काम में तेज़ी आई. 20 साल बाद अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से वापस लौटी. ये वापसी 31 अगस्त की तय डेडलाइन के भीतर हुई.


ये हैं अहम चुनौतियां:-
-अगस्त में तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में आने से पहले, माना जा रहा था कि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद से सर्दियों के दौरान आने वाले खतरे से निपट लेगी. लेकिन जब उनकी सरकार गिर गई तो मदद मिलने का भरोसा भी गायब हो गया. पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान को मदद पर रोक लगा दी है. वे एक ऐसे शासन की मदद नहीं करना चाहते, जो लड़कियों को शिक्षा हासिल करने से रोके और देश में शरिया कानून फिर से लागू करे.

-तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से अफगानिस्तान के सामने भुखमरी की समस्या भी खड़ी हो गई है. देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई है. संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि अफगानिस्तान में लाखों लोगों के सामने भुखमरी का खतरा है.

-संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, यहां के 95 फीसदी लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं हैं. यहां के 2.3 करोड़ लोग भुखमरी की ओर बढ़ते रहे हैं. देश के लिए अगले 6 महीने विनाशकारी होने वाले हैं. संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया से अपील की है कि वो अफगानिस्तान की ओर से मुंह न फेरें और दिक्कत में घिरे लोगों की मदद करें.

-तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से अधिकतर महिला कर्मचारी अपने घरों तक सीमित हैं. काबुल में महिलाओं ने लगातार प्रदर्शन किए हैं, लेकिन स्थिति में ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ है. महिला पत्रकारों को भी काम करने की इजाज़त नहीं है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं समेत कुछ ही महिलाओं को काम करने की अनुमति है.

-तालिबान ने एक अहम वादा सुरक्षा को लेकर किया था. लेकिन स्थितियां तालिबान के काबू में नहीं दिखती हैं. सबसे बड़ी चुनौती इस्लामिक स्टेट की ओर से मिल रही है. हाल में संयुक्त राष्ट्र ने बताया है कि अफगानिस्तान में लगभग हर जगह इस्लामिक स्टेट मौजूद है. हाल के दिनों में देश में इस्लामिक स्टेट के हमले तेज हो गए हैं.
अफगानिस्तान विदेश मंत्रालय के पूर्व सलाहकार फखरुद्दीन करीजादा का कहना है, ‘इन 100 दिनों के दौरान इस्लामिक अमीरात की कूटनीति और विदेश नीति कुछ पड़ोसी और क्षेत्रीय देशों तक ही सीमित रही है (Taliban Afghanistan Control). दुनिया के देश इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि तालिबान ने पहले जो प्रतिबद्धता जताई थी, उसे वह पूरा करता है या फिर नहीं.’ स्थानीय टोलो न्यूज के अनुसार, फिलहाल ईरान, पाकिस्तान, चीन, रूस, तुर्की, कतर, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, इटली और संयुक्त अरब अमीरात सहित 11 देशों ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास खोले हुए हैं.

अफगान संकट के समावेशी हल की जरूरत : शृंगला
भारत ने एक बार फिर दोहराया है कि अफगान संकट का बातचीत के जरिए समावेशी राजनीतिक हल निकालने की जरूरत है. साथ ही कहा है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी दूसरे देश को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.

बुधवार को एक कार्यक्रम के दौरान विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला ने कहा, ‘भारत अफगान मुद्दे पर चिंतित सभी देशों के संपर्क में है. हालांकि, यह भी देखना होगा कि इस मुश्किल परिस्थिति में किस तरह बेहतर ढंग से आगे बढ़ा जा सकता है. भारत अपने क्षेत्र में नई सामरिक हकीकत को लेकर कमजोर स्थिति में नहीं हैं.’

 

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