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वाराणसी में जन्नाथ रथयात्रा स्थगित

वाराणसी में जन्नाथ रथयात्रा स्थगित

कोरोना संक्रमण के कारण इस बार नाथों के नाथ भगवान जगन्नाथ भी शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करेंगे। इस बार न तो जेठ की तपिश मिटाने के लिए पांच जून को भक्तों के हाथ स्नान करने सामने आएंगे और न ही भइया बलभद्र और बहन सुभद्रा संग विहार के लिए निकलेंगे। ऐसे में काशी का लक्खा मेला भी नहीं सजेगा।

ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी के सचिव आलोक शापुरी ने बताया कि कोरोना संक्रमण के मद्देनजर प्रदेश सरकार के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए 23 से 25 जून तक रथयात्रा चौराहे लगने वाला मेला स्थगित किया गया है। कारण यह कि प्रदेश शासन की ओर से किसी धार्मिक और सामाजिक आयोजन पर 30 जून तक रोक है।

रथयात्रा मेला से ही काशी में पर्व-उत्सवों का आरंभ माना जाता है। इसका आधार उत्सव जेठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ को भक्तजन स्नान करा कर करते हैैं। लोकाचार के तहत इसके बाद प्रभु अस्वस्थ होते हैैं और पखवारे भर के लिए विश्राम (क्वारंटाइन) पर जाते हैैं। इस दौरान उन्हें काढ़े का भोग लगाया जाता है।

पुरी पुराधीश्वर की रथयात्रा के विधान ज्येष्ठ पूर्णिमा पर होते हैं शुरू-
पुरी पुराधीश्वर की रथयात्रा के विधान ज्येष्ठ पूर्णिमा पर शुरू होते हैं। इसी दिन नाथों के नाथ प्रभु जगन्नाथ को भक्तगण गर्मी की तपिश से निजात दिलाने के लिए कलश यात्रा निकालते हुए स्नान कराते हैं। इसके साथ ही तीन दिनी लक्खा मेला की रस्म शुरू हो जाती है। इसके ठीक एक पखवारे बाद भगवान जगन्नाथ, भइया बलभद्र व बहन सुभद्रा के साथ मनफेर के लिए निकलेंगे और रथयात्रा महोत्सव आरंभ होगा।

प्राचीन रथयात्रा मेला भी यहां अस्सी क्षेत्र में सजता था-
रथयात्रा महोत्सव की रौनकों में गोते लगाने वाले शहर बनारस के बहुत से लोगों को शायद यह जानकारी न हो कि शिवपुरी काशी की परंपरागत पांच रथयात्रा उत्सवों के अलावा एक छठवां प्राचीन रथयात्रा मेला भी यहां अस्सी क्षेत्र में सजता था। शहर दक्षिणी के एक बड़े क्षेत्र में इसकी मशहूरी का डंका बजता था। अस्सी क्षेत्र के ही छोटा नागपुर बगइचा वाले जगन्नाथ जी और उनसे जुड़े आषाढ़ी उत्सव रथयात्रा की जो कभी इस शहर के मशहूर मेलों की सूची में शुमार हुआ करता था। काशी नगरी के इंद्रधनुषी उत्सवी कैनवास पर एक चटख रंग अपना भी भरता था।

काशी में रथयात्रा मेले का इतिहास शताब्दियों पुराना-
काशी में रथयात्रा मेले का इतिहास शताब्दियों पुराना है। मेला कब और कैसे शुरू हुआ इसे लेकर अलग-अलग लोक मान्यताएं भी हैं। करीब 317 वर्ष पहले जगन्नाथपुरी पुरी मंदिर से आए पुजारी ने ही अस्सी घाट पर जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की थी।

कहा जाता है कि 1690 में पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पुजारी बालक दास ब्रह्मचारी वहां के तत्कालीन राजा इंद्रद्युम्न के व्यवहार से नाराज होकर काशी आ गए थे। पुरी के ही तीर्थ पुरोहित सत्यनारायण जी बताते हैं कि बाबा बालक दास भगवान को लगे भोग का ही प्रसाद ग्रहण करते थे। एक बार भादों में गंगा में बाढ़ आने की वजह से पुरी से प्रसाद पहुंचाने में पखवारे भर से अधिक का विलंब हो गया। इतने दिन पुजारी भूखे ही भगवान का ध्यान करते रहे। तब भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में उनको प्रेरणा दी कि वह काशी में ही मंदिर की स्थापना कर भोग लगाना शुरू करें।इसके बाद बालक दास ने महाराष्ट्र की एक रियासत के राजा की पहल पर भगवान जगन्नाथ के मंदिर का निर्माण कराया। वर्ष 1700 से उन्होंने काशी में रथयात्रा मेला शुरू कराया। इसके अलावा इस मेले के बारे में एक और प्रसंग मिलता है। कहा जाता है कि वर्ष 1790 में पुरी मंदिर से काशी आए स्वामी तेजोनिधि ने गंगा तट पर रहकर जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था। जनश्रुतियों के अनुसार एक बार तेजोनिधि के स्वप्न में भगवान जगन्नाथ आए और पुरी मंदिर के स्वामी रहे तेजोनिधि से कहा कि बाबा विश्वनाथ की नगरी में भी उनकी पूजा होनी चाहिए।

UPDATE BY : ANKITA

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