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क्या कलम को छोड़कर पत्रकार को बंदूक उठाने की जरूरत – काली शंकर उपाध्याय

काली शंकर उपाध्याय की कलम (वाराणसी) – पत्रकार समाज का आईना होता है और जब समाज के आईने के ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं तब सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है आए दिन पत्रकारों के ऊपर हमले हो रहे हैं।

अभी भी तो दिनों ही हाल ही में बीते 16 जुलाई को पत्रकार विक्रम जोशी के ऊपर हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की और विक्रम जोशी जी को गोली लग गई और उनका अस्पताल में मृत्यु हो गई हमलावरों ने एतना भी नहीं देखा की बाइक पर विक्रम जोशी जी की छोटी बच्ची भी थी , सवालिया निशान यह है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे भारत के पत्रकार संगठन बहुत दिनों से राज्य सरकार और केंद्र सरकार से यह मांग करते आ रहे हैं कि पत्रकारों के लिए कुछ ऐसे कानून सरकार लाए जिसे पत्रकार के ऊपर हमला करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिले विक्रम जोशी जी की हत्या हो गई उनके परिवार वालों को नौकरी मिल गई उनकी बच्ची को पढ़ाई लिखाई का खर्चा मिल गया लेकिन कहीं ना कहीं किसी के परिवार का कोई व्यक्ति अगर गुजरता है। तो उसके परिवार की कमी कोई पूरा नहीं कर सकता ना पैसा ना रुपया ना दौलत राज्य सरकार और केंद्र सरकार को मीडिया कर्मी भाइयों के लिए एक ऐसे कठोर कानून बनाने की जरूरत है जिससे कोई भी मीडिया कर्मी पर हमला करने से पहले हजार बार सोचे कि अगर हम मीडिया कर्मी के ऊपर हमला करते हैं तो हमारे ऊपर बड़ी से बड़ी धाराएं लगेंगे जिससे कड़ी से कड़ी सजा मिल सकती है पूरे भारत के पत्रकार संगठन मिलकर आवाज उठा रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकार को जैसे सांप सूंघ गया हो कहीं न कहीं पत्रकारों के लिए यह बहुत ही दुखद घटना है मैं काली शंकर उपाध्याय उत्तर प्रदेश पत्रकार परिषद का राष्ट्रीय सचिव केंद्र सरकार और राज्य सरकार से एक बार फिर मांग करता हूं पत्रकार सहायता के लिए पत्रकारों के हित के लिए एक ऐसी कानून बने जिससे यह दहशत गर्द गुंडागर्दी करने वाले लोग पत्रकारों के ऊपर हमला करने वाले लोग का रूह कांप जाए पत्रकार कलम का सिपाही होता है।

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